.
राजगोपाल सिंह
.
ज़िन्दगी के साथ ही रहती हैं सारी उलझनें,
जितना सुलझाते गए, उतनी उलझती ही गईं,
आदमी थक-हार बैठा पर न हारी उलझनें ।
अपनी-अपनी उलझनों में लोग हैं उलझे हुए,
है किसे फुर्सत जो सुलझाए तुम्हारी उलझनें ।
प्यार की इससे बड़ी पहचान क्या होगी भला,
आपको अपनी लगे हैं सब हमारी उलझनें ।
.
राजगोपाल सिंह
.
ज़िन्दगी के साथ ही रहती हैं सारी उलझनें,
कुछ अजानी और कुछ नामधारी उलझनें ।
जितना सुलझाते गए, उतनी उलझती ही गईं,
आदमी थक-हार बैठा पर न हारी उलझनें ।
अपनी-अपनी उलझनों में लोग हैं उलझे हुए,
है किसे फुर्सत जो सुलझाए तुम्हारी उलझनें ।
प्यार की इससे बड़ी पहचान क्या होगी भला,
आपको अपनी लगे हैं सब हमारी उलझनें ।
.