Monday, 30 April 2012

उलझनें

.
राजगोपाल सिंह
.

ज़िन्दगी के साथ ही रहती हैं सारी उलझनें,
कुछ अजानी और कुछ नामधारी उलझनें ।

जितना सुलझाते गए, उतनी उलझती ही गईं,
आदमी थक-हार बैठा पर न हारी उलझनें ।

अपनी-अपनी उलझनों में लोग हैं उलझे हुए,
है किसे फुर्सत जो सुलझाए तुम्हारी उलझनें ।

प्यार की इससे बड़ी पहचान क्या होगी भला,
आपको अपनी लगे हैं सब हमारी उलझनें ।
.

Sunday, 1 April 2012

खोज

.
शंकर प्रसाद करगेती
.

जलते रेगिस्तान पूछते सावन कैसा होता है,
फुटपाथी बच्चे क्या जानें आंगन कैसा होता है ।

आधी उम्र किताबें ढोकर रोज़गार में खोकर कुछ,
कल कुछ बूढ़े पूछ रहे थे यौवन कैसा होता है ।

बिन बेड़ी के ही बंध जाना और बिंध जाना फूलों से,
तुम भी समझ गये हो शायद बन्धन कैसा होता है । 

Cable TV का है पलना और MTV का झूला,
ये बच्चे क्या याद करेंगे बचपन कैसा होता है ।

क्यों तुम दर्पण बेच रहे हो हम अंधों की बस्ती में,
हमको अब क्या लेना-देना दर्पण कैसा होता है ।