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शंकर प्रसाद करगेती
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जलते रेगिस्तान पूछते सावन कैसा होता है,
फुटपाथी बच्चे क्या जानें आंगन कैसा होता है ।
आधी उम्र किताबें ढोकर रोज़गार में खोकर कुछ,
कल कुछ बूढ़े पूछ रहे थे यौवन कैसा होता है ।
बिन बेड़ी के ही बंध जाना और बिंध जाना फूलों से,
तुम भी समझ गये हो शायद बन्धन कैसा होता है ।
Cable TV का है पलना और MTV का झूला,
ये बच्चे क्या याद करेंगे बचपन कैसा होता है ।
क्यों तुम दर्पण बेच रहे हो हम अंधों की बस्ती में,
हमको अब क्या लेना-देना दर्पण कैसा होता है ।
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शंकर प्रसाद करगेती
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जलते रेगिस्तान पूछते सावन कैसा होता है,
फुटपाथी बच्चे क्या जानें आंगन कैसा होता है ।
आधी उम्र किताबें ढोकर रोज़गार में खोकर कुछ,
कल कुछ बूढ़े पूछ रहे थे यौवन कैसा होता है ।
बिन बेड़ी के ही बंध जाना और बिंध जाना फूलों से,
तुम भी समझ गये हो शायद बन्धन कैसा होता है ।
Cable TV का है पलना और MTV का झूला,
ये बच्चे क्या याद करेंगे बचपन कैसा होता है ।
क्यों तुम दर्पण बेच रहे हो हम अंधों की बस्ती में,
हमको अब क्या लेना-देना दर्पण कैसा होता है ।
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