Wednesday, 29 February 2012

... मगर चुपके से

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पद्मश्री गोपाल दास 'नीरज'
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मुझ पे आकर जो पड़ी उनकी नज़र चुपके से
हो गये अंक गुनाहों के सिफ़र चुपके से ।

ज़िन्दगानी है मेरी जेठ की दोपहरी-सी
बनके बादल कोई बरसो मेरे घर चुपके से ।

सारे संसार की आँखों में खटकता हूँ मैं
तुमको आना हो तो आना मेरे घर चुपके से ।

किसलिए भीड़, ये भगदड़, ये तमाशे-मेले
ख़त्म हो जाएगा इक रोज़ सफ़र चुपके से ।

मेरे हाथों में भी ये चाँद-सितारे होते
वक़्त ग़र काट न देता मेरे पर चुपके से ।

अपना दरवाजा खुला रखना हमेशा 'नीरज'
ज़िन्दगी आती है, आती है मगर चुपके से ।
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Monday, 27 February 2012

लाचारी

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डॉ. कुमार विश्वास
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मैं तेरा ख्वाब तो जी लूँ, मगर लाचारी है
मेरा गुरूर मेरी ख्वाहिशों पे भारी है
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Wednesday, 22 February 2012

Desire

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What I so desire is what I must not let rule me
For what am I if my will ceases to fuel me
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Thursday, 16 February 2012

हैरानगी

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शहरयार


सीने में जलन आँखों में तूफ़ान-सा क्यों है
इस शहर में हर शख्स परेशान-सा क्यों है ।

दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढूंढे
पत्थर की तरह बेहिसो बेजान-सा क्यों है ।

तनहाई की ये कौन-सी मंजिल है रफ़ीको
ताहद्दे नज़र एक बियावान-सा क्यों है ।

हमने तो कोई बात निकाली नहीं ग़म की
वो जूद पशेमान, पशेमान-सा क्यों है । 

क्या कोई नई बात नज़र आती है हममें
आइना हमें देख के हैरान-सा क्यों है ।
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