Wednesday, 29 February 2012

... मगर चुपके से

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पद्मश्री गोपाल दास 'नीरज'
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मुझ पे आकर जो पड़ी उनकी नज़र चुपके से
हो गये अंक गुनाहों के सिफ़र चुपके से ।

ज़िन्दगानी है मेरी जेठ की दोपहरी-सी
बनके बादल कोई बरसो मेरे घर चुपके से ।

सारे संसार की आँखों में खटकता हूँ मैं
तुमको आना हो तो आना मेरे घर चुपके से ।

किसलिए भीड़, ये भगदड़, ये तमाशे-मेले
ख़त्म हो जाएगा इक रोज़ सफ़र चुपके से ।

मेरे हाथों में भी ये चाँद-सितारे होते
वक़्त ग़र काट न देता मेरे पर चुपके से ।

अपना दरवाजा खुला रखना हमेशा 'नीरज'
ज़िन्दगी आती है, आती है मगर चुपके से ।
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