Saturday, 28 January 2012

भूले-भटके ही सही

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पद्मश्री गोपाल दास 'नीरज' 
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जागते रहिये, ज़माने को जगाते रहिये 
मेरी आवाज़ में आवाज़ मिलाते रहिये । 
हमने कल रात जलाये थे जो चौपालों पर 
उन अलावों की ज़रा राख हटाते रहिये । 

नींद आती है तो तकदीर भी सो जाती है 
कोई अब सो न सके गीत वो गाते रहिये । 
भूखा सोने को भी तैयार है ये देश मेरा 
आप परियों के उसे ख्वाब दिखाते रहिये । 

वक़्त के हाथ में पत्थर भी हैं और फूल भी हैं 
चाह फूलों की है तो चोट भी खाते रहिये । 
जाने कब आखिरी ख़त आपके नाम आ जायें 
आपसे जितना बने प्यार लुटाते रहिये । 

रोती आँखें उन्हें मुमकिन है कि याद आ जायें
हाथ हत्यारों के अश्कों से धुलाते रहिये । 
प्यार भी आपको हो जाएगा रफ्ता-रफ्ता 
दिल नहीं मिलता तो नज़रें ही मिलाते रहिये । 

क्या अजब है कि समय फिर से मिला दे हमको 
टूट जाने पे भी रिश्तों को निभाते रहिये । 
आपसे एक गुज़ारिश है यही नीरज की 
भूले-भटके ही सही घर मेरे आते रहिये । 
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