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पद्मश्री गोपाल दास 'नीरज'
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जागते रहिये, ज़माने को जगाते रहिये
मेरी आवाज़ में आवाज़ मिलाते रहिये ।
हमने कल रात जलाये थे जो चौपालों पर
उन अलावों की ज़रा राख हटाते रहिये ।
नींद आती है तो तकदीर भी सो जाती है
कोई अब सो न सके गीत वो गाते रहिये ।
भूखा सोने को भी तैयार है ये देश मेरा
आप परियों के उसे ख्वाब दिखाते रहिये ।
वक़्त के हाथ में पत्थर भी हैं और फूल भी हैं
चाह फूलों की है तो चोट भी खाते रहिये ।
जाने कब आखिरी ख़त आपके नाम आ जायें
आपसे जितना बने प्यार लुटाते रहिये ।
रोती आँखें उन्हें मुमकिन है कि याद आ जायें
हाथ हत्यारों के अश्कों से धुलाते रहिये ।
हाथ हत्यारों के अश्कों से धुलाते रहिये ।
प्यार भी आपको हो जाएगा रफ्ता-रफ्ता
दिल नहीं मिलता तो नज़रें ही मिलाते रहिये ।
क्या अजब है कि समय फिर से मिला दे हमको
टूट जाने पे भी रिश्तों को निभाते रहिये ।
आपसे एक गुज़ारिश है यही नीरज की
भूले-भटके ही सही घर मेरे आते रहिये ।
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