Thursday, 16 February 2012

हैरानगी

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शहरयार


सीने में जलन आँखों में तूफ़ान-सा क्यों है
इस शहर में हर शख्स परेशान-सा क्यों है ।

दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढूंढे
पत्थर की तरह बेहिसो बेजान-सा क्यों है ।

तनहाई की ये कौन-सी मंजिल है रफ़ीको
ताहद्दे नज़र एक बियावान-सा क्यों है ।

हमने तो कोई बात निकाली नहीं ग़म की
वो जूद पशेमान, पशेमान-सा क्यों है । 

क्या कोई नई बात नज़र आती है हममें
आइना हमें देख के हैरान-सा क्यों है ।
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1 comment:

MoonStone said...

Rest in Peace, Shaharyaar sahab .. you will be missed ..